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इन चक्करों में हम फँसते नहीं || आचार्य प्रशांत (2024)

2024-09-03 1 Dailymotion

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वीडियो जानकारी: 06.07.24, वेदान्त संहिता, ग्रेटर नॉएडा

प्रसंग:
~ दुख से मुक्ति कैसे मिले?
~ बेबाक, बिंदास कौन खेलता है?
~ कामना कब दबाव बनाती है?
~ क्यों अनुभव झूठी चीज़ है? और ज्ञान सच्ची?
~ सुख, दुख की समस्या का झूठा समाधान क्यों है?
~ दुख की समस्या का सच्चा समाधान क्या है?

अष्टावक्र गीता

श्लोक 11.4
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते

अन्वय:
सुखदु:खे = सुख और दुख; जन्ममृत्यू = जन्म और मरण; दैवात् एव = दैव से ही होता है; इति = ऐसा; निश्चयी = निश्चय करने वाला; साध्यादर्शो = साध्य कर्म को न देखने वाला; जेडच = और; निरायासः = श्रम-रहित; कुर्वन् = कर्म को करता हुआ; न लिप्यते = नहीं लिप्त होता है।

भावार्थ:
सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु दैव से ही होते हैं, जो ऐसा निश्चय कर लेता है, उसकी दृष्टि में साध्य कुछ नहीं रहता। उसे परिश्रम नहीं होता और कर्म करने पर भी वह लिप्त नहीं होता।

दैव : प्रकृतिगत संयोग जिन्हें लोक संस्कृति में ईश्वरीय आदेश या देव आज्ञा भी मान लिया जाता है।

शारीरिक श्रम : स्थूल वस्तुएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाई जाती हैं। या फिर उनका रूप-रंग, आकार आदि परिवर्तित किया जाता है। शारीरिक श्रम भौतिक परिवर्तन से संबंध रखता है।


संगीत: मिलिंद दाते
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